
Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी को अत्यंत पवित्र और फलदायक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से इस एकादशी का व्रत करता है, उसे जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि, आरती सहित
Saphala Ekadashi Vrat Katha: इस व्रत को करने से मनोवांछित फल, सफलता और सौभाग्य मिलता है। सफला एकादशी का माहात्म्य पढ़ने या सुनने भर से अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है। यह एकादशी असफलता, दुख, बाधाओं और नकारात्मक कर्मों को समाप्त करने वाली मानी जाती है।
🪔 सफला एकादशी की पूजा-विधि
- सुबह स्नान और शुद्धि:
व्रत के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। - भगवान विष्णु की पूजा:
पीतांबरधारी श्रीविष्णु या श्रीनारायण की मूर्ति/चित्र पर गंगाजल छिड़कें, दीप जलाएं, धूप, चंदन, पुष्प, तुलसीदल, फल और भोग अर्पित करें। - व्रत और उपवास:
आम तौर पर दिनभर उपवास किया जाता है। फलाहार भी स्वीकार्य है, लेकिन अन्न का त्याग आवश्यक है। - कथा-श्रवण:
सफला एकादशी व्रत कथा को पढ़ना अथवा सुनना अनिवार्य माना गया है। - रात का जागरण:
रात में भगवान विष्णु के नामों का जाप करें, दीपक जलाएं और यथासंभव रात्रि-जागरण करें। माना जाता है कि जागरण करने से व्रत का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। - द्वादशी का पारण:
अगले दिन द्वादशी तिथि में नहाकर भगवान को भोग लगाएं और फिर विधि अनुसार पारण करें।
पारण से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराना या दान देना अत्यंत शुभ माना गया है।
⭐ सफला एकादशी व्रत कथा | Saphala Ekadashi Vrat Katha

पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस व्रत के माहात्म्य के बारे में पूछा, तो भगवान बोले—हे राजन! जिस प्रकार शेषनाग नागों में, गरुड़ पक्षियों में और अश्वमेध यज्ञ यज्ञों में श्रेष्ठ माना जाता है, उसी प्रकार सभी व्रतों में एकादशी का व्रत सर्वोत्तम है। एकादशी का पालन करने वाला मनुष्य मुझे अत्यंत प्रिय होता है, क्योंकि मैं भारी दक्षिणा वाले यज्ञ से भी अधिक प्रसन्न उस व्यक्ति पर होता हूँ, जो भक्ति और संकल्प से एकादशी का व्रत करता है। इसलिए हे धर्मराज! अब तुम ध्यानपूर्वक सफला एकादशी की कथा सुनो।
चम्पावती नाम की नगरी का राजा महिष्मान था, जिसके चार पुत्रों में बड़ा पुत्र लुम्पक अत्यंत दुष्ट, अधर्मी और पापी स्वभाव का था। वह परस्त्रीगमन, अपराध, चोरी और दुराचार में लिप्त रहता तथा पिता के धन को व्यर्थ नष्ट करता था। देवताओं, ब्राह्मणों और भक्तों की निंदा करना उसका स्वभाव था। जब राजा को उसके कुकर्मों की जानकारी मिली, तो उन्होंने उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। राज्य से निकाले जाने पर लुम्पक चोरी करने के लिए दिन में जंगल में छिपा रहता और रात में नगर में आकर प्रजा को परेशान करता। धीरे-धीरे पूरा नगर उससे भयभीत हो गया और वह जंगल में रहकर पशु मारकर अपना जीवन बिताने लगा।
जिस वन में वह रहता था, वहाँ एक अत्यंत विशाल और पुरातन पीपल का वृक्ष था, जिसे लोग भगवान की तरह पूजते थे। लुम्पक उसी वृक्ष के नीचे रहता था। पौष कृष्ण दशमी की रात अत्यधिक शीत पड़ रही थी और वस्त्रहीन होने के कारण वह पूरी रात कांपता रहा। सुबह होते-होते वह अत्यंत कष्ट से मूर्छित हो गया। अगले दिन एकादशी के मध्याह्न में सूर्य की गर्मी से उसकी चेतना लौटी। वह इतना दुर्बल हो गया था कि शिकार भी नहीं कर सका। इसलिए पेड़ों के नीचे गिरे हुए फल उठाकर पीपल के नीचे ले आया। सूर्यास्त होने पर उसने वे फल भगवान को अर्पित करते हुए कहा—“हे प्रभु! इन फलों को स्वीकार कीजिए, यही मेरी भेंट है।” उस रात भी उसे ठंड और पीड़ा के कारण नींद नहीं आई और अनजाने में उसने उपवास तथा रात्रि-जागरण कर लिया।
उसके इस अनजाने उपवास, फलों के अर्घ्य और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए तथा उसी क्षण उसके सारे पाप नष्ट हो गए। अगले दिन प्रातः एक अलंकृत, दिव्य घोड़ा उसके सामने खड़ा था और आकाशवाणी हुई—“हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे सभी पाप नष्ट हो चुके हैं। अब तू अपने पिता के पास जा और उनसे राज्य ले।” यह सुनकर लुम्पक अत्यंत प्रसन्न हुआ। दिव्य वस्त्र धारण कर वह पिता के पास गया। राजा अपने पुत्र के परिवर्तन से प्रसन्न हुए और उन्होंने राज्य का संपूर्ण भार उसी को सौंप दिया। बाद में लुम्पक धर्मपूर्वक राज्य चलाने लगा, उसका परिवार भगवान का भक्त हो गया और वृद्धावस्था में वह वन में तप करने चला गया तथा अंततः वैकुण्ठधाम को प्राप्त हुआ।
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