Shri Hanumat Tandava Stotram: श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् (Shri Hanumat Tandava Stotram) भगवान श्री हनुमान जी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य स्तोत्र है। इसकी रचना 17वीं शताब्दी में संत-कवि स्वामी समर्थ रामदास जी ने मराठी भाषा में की थी। इस स्तोत्र में हनुमान जी के अद्भुत तेज, वीरता, बल, करुणा और उनकी दिव्य महिमा का वर्णन मिलता है।
श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्: संकटों का अंत करने वाला दिव्य तांडव स्तोत्र | Shri Hanumat Tandava Stotram
Shri Hanumat Tandava Stotram: इस स्तोत्र का पाठ विशेषकर मंगलवार की प्रातःकाल करने की परंपरा है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करने पर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को अदृश्य सुरक्षा, साहस और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् पाठ करने की विधि
- श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् का पाठ मंगलवार और शनिवार से प्रारंभ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- पाठ से पहले स्नान कर लाल या पीले स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक, लाल फूल, सिंदूर और गुड़-चना अर्पित करें।
- “ॐ हनुमते नमः” मंत्र का कम से कम 11 बार जाप कर मन को केंद्रित करें।
- इसके बाद श्रद्धापूर्वक श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् का पाठ आरंभ करें।
- पाठ करते समय मन में किसी भी प्रकार का भय, क्रोध या नकारात्मक विचार न रखें।
- स्तोत्र पाठ समाप्त होने पर हनुमान चालीसा या आरती करना अत्यंत शुभ फल देता है।
- पाठ के बाद हनुमान जी से अपने और परिवार के कल्याण एवं सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें।
- लगाए हुए भोग (गुड़-चना या बूंदी) को परिवार में प्रसाद रूप में बाँट दें।
- अधिकतम फल के लिए इस स्तोत्र का नियमित या 41 दिनों तक अनुष्ठान रूप से पाठ श्रेष्ठ माना गया है।
श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् (Shri Hanumat Tandava Stotram)
॥ ध्यान॥
वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम्।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥
॥ स्तोत्र पाठ ॥
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं,
दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम्।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं,
समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम्॥1॥
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं
वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वान-
राऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः॥2॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना,
भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ,
विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम्॥3॥
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः,
कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम्।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः
कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः॥4॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं,
फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत्।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्,
सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम्॥5॥
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं
गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम्।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनायकं
विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम्॥6॥
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं
दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम्।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम्
सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम्॥7॥
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता
महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां
निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम्॥8॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह॥9॥
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम्॥10॥
॥ इति श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
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श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् के लाभ

- यह स्तोत्र भय, कष्ट, रोग, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियों को तुरंत नष्ट करता है।
- साधक में अद्भुत साहस, शक्ति, आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता का विकास होता है।
- अचानक आने वाली विपत्तियाँ, संकट और बाधाएँ स्वतः दूर होने लगती हैं।
- नौकरी, व्यापार, कोर्ट केस और ग्रहदोष में भी यह स्तोत्र चमत्कारिक रूप से लाभकारी सिद्ध होता है।
- यह स्तोत्र हनुमान जी के तांडव स्वरूप का आवाहन करता है, जिससे साधक के चारों ओर रक्षा कवच स्थापित हो जाता है।
- घर में शांति, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
- डर, नींद में बाधा, बुरी नज़र और नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है।












