
Somvar Vrat Katha: सोमवार व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और इसे अत्यंत शुभ एवं फलदायी माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इस दिन उपवास रखता है, उसके जीवन से सभी बाधाएं और कष्ट दूर हो जाते हैं।
Somvar Vrat Katha 2025: सोमवार व्रत की कथा, पूजन विधि, आरती और महत्व
सोमवार व्रत का महत्व
Somvar Vrat Katha: सोमवार व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावी उपाय माना गया है। जो भी भक्त श्रद्धा और निष्ठा से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन के सभी दुख, संकट और मनोकामनाएं समाप्त होती हैं। ऐसा कहा गया है कि इस दिन भगवान शिव पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और मनुष्य को मानसिक शांति व सुख की प्राप्ति होती है। सोमवार व्रत विशेष रूप से विवाह, संतान, और समृद्धि की कामना से किया जाता है।
सोमवार व्रत पूजा व विधि
Somvar Vrat Katha: सोमवार के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर या किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव का ध्यान करें। शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, शहद, दही और बेलपत्र अर्पित करें। सफेद पुष्प और अक्षत चढ़ाएं। दीप जलाकर धूप अर्पित करें और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।
व्रत रखने वाले दिन एक समय फलाहार या केवल दूध का सेवन करें। दिनभर भगवान शिव की कथा सुनना, रुद्राभिषेक करना और शिव चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है। शाम के समय आरती करने के बाद शिव जी से अपने मन की इच्छा व्यक्त करें।
सोमवार व्रत कथा | Somvar Vrat Katha
Somvar Vrat Katha: भगवान शिव को अत्यंत दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाला देवता माना गया है। उनके भोले स्वभाव के कारण ही वे “भोलेनाथ” कहलाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि महादेव को प्रसन्न करने के लिए कोई कठिन तप या अनुष्ठान आवश्यक नहीं होता—वे तो अपने भक्त की सच्ची श्रद्धा और भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं। सोमवार का व्रत इसी भावना का प्रतीक है। इस दिन व्रत रखने और सोमवार व्रत कथा का पाठ करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी समाप्त हो जाते हैं।
बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसका जीवन धन-संपत्ति और सभी सुविधाओं से भरपूर था, लेकिन उसके घर में संतान नहीं थी। संतान की प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार को उपवास रखता और शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा से पूजा करता था। उसकी अटूट भक्ति और निष्ठा देखकर माता पार्वती प्रसन्न हुईं। वे भगवान शिव से बोलीं — “हे स्वामी! आप तो अपने भक्तों की पुकार तुरंत सुन लेते हैं। कृपया इस साहूकार पर भी कृपा करें और इसे संतान का वर दें।”
माता पार्वती की विनती सुनकर भगवान शिव ने कहा, “हे देवी, प्रत्येक जीव को अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगना पड़ता है। यह संसार का अटल नियम है।” लेकिन माता पार्वती अपने भक्त के लिए अडिग रहीं और उन्होंने भगवान से साहूकार की मनोकामना पूरी करने का आग्रह किया। अंततः शिव जी ने पार्वती जी के आग्रह पर प्रसन्न होकर साहूकार को संतान का वरदान दे दिया, परंतु साथ ही यह भी कहा — “यह बालक अल्पायु होगा और केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रहेगा।”
उधर साहूकार मंदिर के पास ही खड़ा था और भगवान शिव व माता पार्वती के बीच हुई सारी बातें सुन चुका था। इसलिए जब उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान मिला, तब भी उसके मन में खुशी के बजाय चिंता थी। फिर भी उसने अपना विश्वास नहीं खोया और पहले की तरह ही निष्ठा से भगवान भोलेनाथ की उपासना करता रहा।
कुछ समय बाद साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और नौ महीने पूरे होने पर एक सुंदर और तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। बालक बड़ा होशियार और विनम्र स्वभाव का था। जब वह ग्यारह वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसके मामा को बुलाकर कहा—
“भाई, इसे काशी ले जाओ ताकि यह धर्म और ज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर सके। मार्ग में जहां-जहां अवसर मिले, यज्ञ, दान और पुण्य कर्म अवश्य करते रहना।”
मामा और भांजा यात्रा पर निकल पड़े। रास्ते में वे एक नगर से गुज़रे, जहां राजा की पुत्री का विवाह हो रहा था। किंतु दुल्हा एक आंख से काना था। जब राजा ने साहूकार के बेटे को देखा, तो उसकी सुंदरता और तेज से बहुत प्रभावित हुआ। उसने मामा से निवेदन किया—
“कृपया अपने भांजे को कुछ समय के लिए हमारे यहां रोक लीजिए। विवाह संपन्न हो जाने के बाद आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं।” राजा ने मामा को बहुत सारा धन और सम्मान देकर मना लिया। इस प्रकार अनजाने में साहूकार के पुत्र का विवाह उस राजकुमारी से संपन्न हो गया।
साहूकार का बेटा सच्चा और धर्मनिष्ठ था। विवाह के बाद उसे जब विदा करने की बात आई, तो उसने एक चिट्ठी में राजकुमारी के लिए लिखा— “तुम्हारा विवाह वास्तव में मुझसे हुआ है, परंतु जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आंख से काना है।” जब राजकुमारी ने यह पत्र पढ़ा, तो उसने प्रण किया— “स्वामी, मैंने अग्नि को साक्षी मानकर आपके साथ फेरे लिए हैं, अब मैं किसी और को पति के रूप में स्वीकार नहीं करूंगी।”
यह सुनकर साहूकार का पुत्र भावुक हो उठा। उसने कहा— “ऐसा मत कहो, देवी! मैं अल्पायु हूं, भगवान शिव ने स्वयं कहा था कि मैं बारहवें वर्ष तक ही जीवित रहूंगा।” परंतु राजकुमारी ने दृढ़ स्वर में कहा— “जो मेरे भाग्य में लिखा है, वही होगा। यदि मृत्यु भी नियति है, तो मैं उसे भी स्वीकार करूंगी।”
राजकुमारी ने अपनी दृढ़ता की बात अपने माता-पिता को बताई। यह सुनकर राजा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी पुत्री को उस राजकुमार के साथ विदा किए बिना ही बारात वापस लौटा दी।
इधर, साहूकार का पुत्र और उसका मामा काशी पहुंचे। वहाँ जाकर उन्होंने अनेक यज्ञ और अनुष्ठान संपन्न किए, और साहूकार का बेटा अध्ययन और विद्या ग्रहण करने में लग गया।
लेकिन जिस दिन बालक 12 वर्ष का हुआ, उसी दिन उसकी तबियत अचानक बिगड़ने लगी। उसने अपने मामा से कहा, “मामा, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है।” मामा ने उसे आराम करने के लिए अंदर भेजा। बालक अंदर जाकर शांति से लेट गया, पर नियति के अनुसार यही वह दिन था जब उसके प्राण चले जाने थे। कुछ ही समय में उसकी मृत्यु हो गई। मामा यह देख कर अत्यंत शोक में विलाप करने लगे।
संयोगवश, उसी समय भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती उस मार्ग से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने शिव जी से कहा—
“हे स्वामी! यह करुण स्वर किस ओर से आ रहा है? मुझे यह देख कर सहन नहीं हो रहा। कृपया इन कष्टों का निवारण करें।”
माता पार्वती की विनती सुनकर भगवान शिव मृत बालक के पास पहुँचे और देखा कि यह वही साहूकार का पुत्र है, जिसका जन्म उन्होंने स्वयं माता पार्वती के आग्रह पर वरदान स्वरूप कराया था। अब उसका जीवन नियति के अनुसार पूर्ण हो चुका था।
माता पार्वती दुखी होकर भोलेनाथ से कहने लगीं— “हे प्रभु! इस बालक को मृत देखकर इसके माता-पिता अपने वियोग में अपनी प्राणों की आहुति दे देंगे। कृपया मेरी विनती स्वीकार करें और इसे पुनः जीवनदान दें।”
मां पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने तुरंत आशीर्वाद दिया और बालक फिर से जीवित हो गया। अपने गुरु और मामा के मार्गदर्शन में उसने अपनी शिक्षा पूरी की और फिर अपने मामा के साथ नगर की ओर लौट पड़ा।
रास्ते में वे उसी नगर पहुंचे, जहां राजकुमारी के साथ उसका विवाह हुआ था। वहाँ पहुंचकर उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें राजकुमारी के पिता, यानी नगर के राजा, भी उपस्थित थे। जैसे ही उन्होंने साहूकार के बेटे को देखा, उन्होंने उसे तुरंत पहचान लिया और महल में ले जाकर उसका बड़े सम्मान और आदर के साथ सत्कार किया। इसके बाद राजा ने अपनी पुत्री को पुत्र के साथ विदा कर दिया।
इधर, साहूकार और उसकी पत्नी कई दिनों से भूखे-प्यासे अपने बेटे के वापस आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया था कि यदि उनका बेटा जीवित नहीं हुआ, तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे। उसी रात भगवान भोलेनाथ उनके सपने में आए और बोले— “हे साहूकार! मैंने तुम्हारे सोमवार व्रत और व्रत कथा से प्रसन्न होकर तुम्हारे पुत्र को पुनः जीवनदान दिया है।”
अपने बेटे के जीवित होने की खबर पाकर साहूकार दंपत्ति अत्यंत खुश हुए। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को हृदय से धन्यवाद दिया और अपनी श्रद्धा एवं भक्ति में और बढ़ोतरी की।
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