
शुभ कातिक सिर विचारी तजो वनवारी चौताल गीत | Shubh Katik Sir Vichari Lyrics
शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी ||
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी || तजो वनवारी ||
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी || तजो वनवारी ||
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी || तजो वनवारी ||
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी || तजो वनवारी ||
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी || तजो वनवारी ||
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी || तजो वनवारी ||
आवत माघ बसंत जनावत,
झूमर चौतार झमारी || तजो वनवारी ||
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत,
ऐसे काम न करहु विहारी || तजो वनवारी ||
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