
सोलह सोमवार व्रत भगवान भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली साधन माना गया है। जो भी भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ यह व्रत करता है, उसके जीवन से दुख, दरिद्रता और संकट दूर हो जाते हैं। अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है, और दांपत्य जीवन में प्रेम, शांति और सौहार्द बना रहता है। इस व्रत के प्रभाव से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं, क्योंकि यह व्रत स्वयं महादेव के आशीर्वाद से सिद्ध माना गया है। भगवान शिव भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं और जीवन को सुख, समृद्धि और संतोष से भर देते हैं।
Solah Somvar Vrat Katha: सोलह सोमवार व्रत कथा, विधि, और आरती सहित
Solah Somvar Vrat Katha:एक बार भगवान महादेव जी माता पार्वती के साथ भ्रमण करते हुए मृत्यु लोक में आए। यात्रा करते-करते वे अमरावती नगर पहुँचे, जहाँ के राजा ने भगवान शिव का एक भव्य मंदिर बनवाया था। भगवान शंकर और माता पार्वती वहीं कुछ समय के लिए ठहर गए। एक दिन माता पार्वती ने मुस्कुराते हुए भगवान शिव से कहा, “नाथ! आइए आज चौसर का खेल खेलें।” भगवान शिव ने सहमति जताई और खेल आरंभ हुआ। तभी मंदिर का पुजारी पूजा करने आया। पार्वती जी ने खेल के बीच में पुजारी से पूछा, “पुजारी जी, बताइए—इस खेल में जीत किसकी होगी?”
पुजारी जी ने बिना कुछ सोचे तुरंत उत्तर दिया, “माता, निश्चित ही भगवान भोलेनाथ ही जीतेंगे।” लेकिन हुआ इसके विपरीत—खेल में पार्वती जी जीत गईं। यह देखकर पार्वती जी क्रोधित हो उठीं और बोलीं, “तुमने असत्य कहा है, इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि तुम कोढ़ से पीड़ित हो जाओ।” पुजारी जी तुरंत कोढ़ी हो गए और उनका शरीर धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
कुछ दिनों बाद देवलोक की अप्सराएँ मंदिर में पूजन के लिए आईं। उन्होंने जब पुजारी को उस अवस्था में देखा तो कारण पूछा। पुजारी जी ने पूरी बात बता दी—कैसे माता पार्वती के श्राप से वे रोगी बन गए। यह सुनकर अप्सराएँ बोलीं, “पुजारी जी, आप भगवान शिव का सोलह सोमवार व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से आपके सभी कष्ट दूर होंगे।”
पुजारी जी ने उत्सुकता से पूछा, “देवी, कृपया बताइए, यह व्रत कैसे किया जाता है?” तब अप्सराओं ने कहा, “हर सोमवार को सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर उसे तीन भागों में बाँट लें। भगवान शिव के समक्ष घी का दीपक जलाएँ और गुड़, नैवेद्य, फूल, बेलपत्र, चंदन, अक्षत और जनेऊ लेकर प्रदोष काल में विधिवत पूजा करें। पूजा के बाद चूरमे का एक भाग भगवान शिव को अर्पित करें, एक भाग स्वयं ग्रहण करें और तीसरा भाग प्रसाद स्वरूप सबमें बाँट दें। इस प्रकार लगातार सोलह सोमवार तक व्रत करें। सत्रहवें सोमवार को पाँच सेर गेहूं की बाटी का चूरमा बनाकर भोग लगाएँ और पूरे परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें। ऐसा करने से भगवान शिव आपके सभी दुख और रोग दूर कर देंगे।”
इतना कहकर अप्सराएँ स्वर्गलोक लौट गईं। पुजारी जी ने श्रद्धा और विधि से व्रत किया और कुछ ही समय में पूरी तरह स्वस्थ हो गए। कुछ दिनों बाद जब भगवान शिव और माता पार्वती फिर से उस मंदिर में आए, तो उन्होंने पुजारी को स्वस्थ देखकर आश्चर्य किया। पार्वती जी ने पूछा, “पुजारी जी, तुम्हारा यह रोग कैसे ठीक हो गया?” तब पुजारी ने पूरी कथा सुनाई।
पुजारी के वचन सुनकर माता पार्वती जी ने भी सोलह सोमवार व्रत करने का निश्चय किया। व्रत के प्रभाव से उनका पुत्र कार्तिकेय जी और भी आज्ञाकारी और मातृभक्त बन गया। जब कार्तिकेय जी ने पूछा, “मां, आज मेरा मन आपके चरणों में इतना स्थिर क्यों है?” तब माता ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “बेटा, यह सब सोलह सोमवार व्रत का प्रभाव है।” कार्तिकेय जी ने भी यह व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपना बिछड़ा हुआ प्रिय मित्र मिल गया। जब उस मित्र ने कारण पूछा, तो उसने भी विवाह की इच्छा से वही व्रत किया।
एक दिन वही ब्राह्मण कुमार विदेश चला गया। वहाँ के राजा ने अपनी पुत्री के स्वयंवर का आयोजन किया था। राजा ने घोषणा की थी कि जिस व्यक्ति को उसकी हथिनी (हाथीनी) माला पहनाएगी, वही राजकुमारी का पति बनेगा। अनेक राजकुमार और वीर वहाँ उपस्थित थे। उस ब्राह्मण कुमार ने भी स्वयंवर देखने की इच्छा से सभा में जाकर एक ओर बैठ गया।
जब स्वयंवर का समय आया, तो हथिनी फूलों की माला लेकर राजकुमारों के बीच घूमने लगी। सबकी आँखें उसी पर टिकी थीं। परंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि हथिनी जाकर उस साधारण ब्राह्मण कुमार के गले में माला डाल दी। उपस्थित लोग आश्चर्यचकित रह गए। राजा ने इसे देव इच्छा मानकर बड़ी धूमधाम से अपनी पुत्री का विवाह उसी ब्राह्मण कुमार से कर दिया।
दोनों कुछ समय तक प्रेम और सुखपूर्वक रहने लगे। एक दिन राजकन्या ने अपने पति से पूछा — “स्वामी, आपने कौन-सा ऐसा पुण्य किया था कि राजाओं और राजकुमारों को छोड़कर हथिनी ने आपको ही चुना?” तब ब्राह्मण ने नम्र भाव से कहा — “मैंने सोलह सोमवार व्रत किया था। इसी व्रत के प्रभाव से यह सब संभव हुआ।”
राजकन्या ने पुत्र प्राप्ति की कामना से वही व्रत आरंभ किया। भगवान शिव की कृपा से उसे एक सुंदर और सर्वगुण संपन्न पुत्र प्राप्त हुआ। जब पुत्र बड़ा हुआ, तो उसने अपनी माता से पूछा — “मां, किस पुण्य से मुझे जैसा पुत्र आपको मिला?” राजकन्या ने मुस्कुराते हुए सोलह सोमवार व्रत की पूरी विधि और महिमा उसे बताई। पुत्र ने राज्य की प्राप्ति की इच्छा से यह व्रत करना शुरू किया।
कुछ ही समय में दूसरे राज्य के राजा के दूत वहाँ आए और उन्होंने उसे अपनी राजकुमारी के स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया। वह वहाँ गया, और राजकुमारी ने उसे ही वर रूप में चुन लिया। विवाह अत्यंत हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ।
कुछ समय बाद जब पुराने राजा का निधन हुआ, तो ब्राह्मण कुमार को ही राजगद्दी प्राप्त हुई। वह राजा बनकर भी सोलह सोमवार व्रत श्रद्धा से करता रहा। एक दिन उसने अपनी रानी से कहा — “आज तुम पूजा की सामग्री शिवालय तक पहुँचा दो।” परंतु रानी ने स्वयं जाने के बजाय दासियों को भेज दिया। राजा ने जब पूजन समाप्त किया, तभी आकाशवाणी हुई — “राजन, इस स्त्री को त्याग दो, अन्यथा यह तुम्हारे सर्वनाश का कारण बनेगी।” भगवान की आज्ञा मानकर राजा ने भारी मन से रानी को महल से निकाल दिया।
रानी दुखी होकर अपने भाग्य को कोसती हुई नगर से निकल गई। रास्ते में उसे एक वृद्धा मिली। उसने दया दिखाते हुए रानी को अपने घर में रहने दिया और उसके सिर पर सूत की पोटली रखकर बाजार भेजा। लेकिन रास्ते में आँधी आई और पोटली उड़ गई। यह देखकर वृद्धा ने क्रोधित होकर उसे घर से भगा दिया।
वह भटकती हुई एक तेली के घर पहुँची, पर जैसे ही उसने बर्तन छुए, वे सब फट गए। तेली ने भी डरकर उसे निकाल दिया। प्यास से व्याकुल होकर वह नदी के पास पहुँची, पर जैसे ही उसने जल लेने के लिए हाथ बढ़ाया, नदी सूख गई। वह सरोवर पहुँची, तो उसके स्पर्श मात्र से पानी में कीड़े पड़ गए। जिस पेड़ के नीचे विश्राम करने जाती, वह भी सूख जाता।
वन और सरोवर की इस दशा को देखकर कुछ ग्वाल उसे पास के मंदिर में रहने वाले गोसाई जी के पास ले गए। गोसाई जी ने रानी की अवस्था देखकर समझ लिया कि यह कोई कुलीन स्त्री है, जो किसी दुर्भाग्य के कारण विपत्ति में पड़ी है। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा —
“बेटी, तू मेरे यहाँ रह, चिंता मत कर।”
रानी आश्रम में रहने लगी, लेकिन दुर्भाग्यवश जिस वस्तु को वह छूती, उसमें कीड़े पड़ जाते। दुखी होकर गोसाई जी ने उससे पूछा —
“बेटी, किस देवता के अपराध से तेरा यह हाल हुआ?” रानी ने रोते हुए सारी घटना विस्तार से सुनाई। गोसाई जी ने करुणा दिखाते हुए कहा — “बेटी, अब तुम भगवान शिव का सोलह सोमवार व्रत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा।”
रानी ने पूरी श्रद्धा और विधि से व्रत किया। व्रत पूरा होते ही भगवान शिव की कृपा से राजा को रानी की याद सताने लगी। उसने अपने दूतों को उसकी खोज में भेजा।
दूतों ने रानी को गोसाई जी के आश्रम में पाया और राजा को समाचार दिया। राजा तुरंत वहाँ पहुँचा और गोसाई जी से कहा —
“महाराज, यह मेरी पत्नी है। भगवान शिव के आदेश से मैंने इसका परित्याग किया था, पर अब शिव कृपा से इसे वापस लेने आया हूँ। कृपया अनुमति दें।”
गोसाई जी ने प्रसन्न होकर रानी को लौट जाने की आज्ञा दी। राजा और रानी नगर लौटे, तो पूरे नगर में उत्सव का माहौल छा गया। सड़कों पर फूल बिछाए गए, बाजे बजने लगे, और मंगलाचार के साथ नगरवासियों ने उनका स्वागत किया।
तत्पश्चात भगवान शिव की असीम कृपा से वह राजा प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करने लगा और अपनी रानी के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। कहा गया है कि जो भी मनुष्य भक्ति, विश्वास और पूर्ण विधि-विधान के साथ सोलह सोमवार व्रत करता है तथा इसकी पवित्र कथा को श्रद्धा से सुनता है — उसकी हर मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है। इस व्रत के प्रभाव से जीवन में समृद्धि, शांति और संतोष का वास होता है। अंततः वह भक्त शिव कृपा से मोक्ष प्राप्त कर शिवलोक को जाता है, जहाँ उसे अनंत सुख और शाश्वत आनंद की प्राप्ति होती है।
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