Chhath Puja Katha in Hindi 2025: छठी मैया की पौराणिक कथा, पूजन विधि और नियम | छठ पूजा व्रत कथा 2025

Chhath Puja Katha in Hindi, छठी मैया की पौराणिक कथा, छठ पूजा व्रत कथा
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Chhath Puja Ki Katha, Kahani And Story in Hindi (छठ पूजा की कथा): कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ होकर सप्तमी तिथि तक चलने वाला छठ महापर्व भारत का एक अत्यंत पवित्र और दिव्य त्योहार है। यह पर्व सूर्य भगवान और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित होता है। माना जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा, निष्ठा और पूर्ण नियमों के साथ करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त करता है।

Chhath Puja Katha in Hindi: छठी मैया की पौराणिक कथा

इस दौरान व्रती महिलाएँ चार दिनों तक कठोर नियमों का पालन करती हैं — निर्जला उपवास रखती हैं, सूर्य को अर्घ्य देती हैं और छठी मैया से अपने परिवार की मंगलकामना करती हैं।

कहते हैं कि जो भी भक्त छठी मैया की कथा श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन से दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं और उस पर माँ की असीम कृपा बनी रहती है। यही कारण है कि छठ पूजा की कथा सुने बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है।

Chhath Puja 2025 Chhathi Maiya Vrat Katha: हिंदू धर्म में छठ पूजा का अत्यंत विशेष और पवित्र महत्व माना गया है। यह महापर्व भारतीय संस्कृति की आस्था, तपस्या और सूर्य उपासना की अनूठी परंपरा का प्रतीक है। छठ पूजा में सूर्य देव — जो जीवन, ऊर्जा और आरोग्य के अधिष्ठाता माने जाते हैं — तथा उनकी बहन छठी मैया की विधि-विधानपूर्वक पूजा की जाती है।

चार दिनों तक चलने वाला यह महान अनुष्ठान इस वर्ष 25 अक्टूबर 2025 से ‘नहाय-खाय’ के साथ आरंभ हो रहा है और 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ संपन्न होगा। इन चार दिनों के दौरान व्रती महिलाएँ निष्ठा, पवित्रता और संयम के साथ कठोर नियमों का पालन करती हैं, ताकि सूर्य देव और छठी मैया की कृपा से परिवार में सुख-शांति, संतान-सौभाग्य और समृद्धि बनी रहे।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठ व्रत का आरंभ त्रेता युग में हुआ था, जब भगवान श्रीराम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद सूर्य देव की उपासना कर यह व्रत किया था। इसी प्रकार द्वापर युग में महान योद्धा कर्ण, जो सूर्य देव के पुत्र माने जाते हैं, प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते थे।
इसके अलावा, राजा प्रियंवद द्वारा की गई सूर्य पूजा से भी इस महापर्व की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। कहते हैं, जब राजा प्रियंवद को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब ऋषि कश्यप के मार्गदर्शन में उन्होंने सूर्य उपासना की और छठी मैया की कृपा से उन्हें संतान प्राप्त हुई।

तभी से इस व्रत को “संतान-सौभाग्य और सुख-समृद्धि देने वाला महापर्व” कहा जाने लगा।

इस प्रकार, छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, आत्मसंयम और कृतज्ञता का दिव्य पर्व है — जो मनुष्य को प्रकृति, सूर्य और मातृत्व की शक्तियों से जोड़ता है।

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छठ पूजा की पौराणिक कथा

छठ पूजा से जुड़ी सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध पौराणिक कथा राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी से संबंधित मानी जाती है। कहा जाता है कि राजा प्रियव्रत एक धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजा-वत्सल शासक थे, परंतु उनके जीवन में एक ही दुख था — उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी। इस कारण राजा और रानी दोनों ही अत्यंत दुखी और निराश रहने लगे।

संतान प्राप्ति की कामना से उन्होंने महर्षि कश्यप के मार्गदर्शन में एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ पूर्ण होने पर ऋषि ने रानी मालिनी को खीर का दिव्य प्रसाद ग्रहण करने को दिया। प्रसाद लेने के पश्चात रानी गर्भवती हुईं, परंतु दुर्भाग्यवश जब समय आया, उन्होंने एक मृत शिशु को जन्म दिया।
यह देखकर राजा प्रियव्रत शोकाकुल हो उठे और उन्हें लगा कि जीवन अब व्यर्थ है। उन्होंने व्यथित होकर अपने जीवन का अंत करने का निर्णय लिया।

इसी निराशा के क्षण में उनके सामने एक दिव्य तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं। उनके मुखमंडल से दिव्य प्रकाश निकल रहा था और वातावरण में सुगंध फैल गई थी। देवी ने राजा से कहा —

“हे राजन! मैं ब्रह्मा जी की पुत्री और सृष्टि की छठी शक्ति हूँ। मुझे ही षष्ठी देवी या छठी मैया कहा जाता है। यदि तुम सच्चे मन से मेरी आराधना करोगे और लोगों में भी मेरे पूजन का प्रसार करोगे, तो तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी और तुम्हें पुत्र प्राप्ति का सुख मिलेगा।”

राजा प्रियव्रत ने देवी के आदेशानुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बड़ी श्रद्धा और नियमपूर्वक षष्ठी देवी की पूजा-अर्चना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र का आशीर्वाद दिया।

तभी से इस पावन दिन को छठी मैया की पूजा का दिवस माना गया, और इसी से छठ महापर्व की शुरुआत हुई।
माना जाता है कि जो भी भक्त निष्ठा और शुद्ध भाव से छठी मैया की आराधना करता है, उसके जीवन से संताप, दुर्भाग्य और रोग दूर हो जाते हैं — और उसके घर में सुख, समृद्धि और संतान-सौभाग्य का वास होता है।

भगवान श्रीराम और माता सीता द्वारा सूर्य पूजा की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्रीराम और माता सीता ने स्वयं छठ व्रत का आरंभ किया था। लंकापति रावण का वध कर जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तब उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से ग्रसित माना गया, क्योंकि रावण एक ब्राह्मण कुल का विद्वान था। इस पाप से मुक्त होने के लिए श्रीराम ने ऋषि-मुनियों से उपाय पूछा।

तब महान तपस्वी ऋषि मुग्दल ने श्रीराम को बताया —

“हे रघुनंदन! यदि आप कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पूर्ण नियम, संयम और श्रद्धा से सूर्य देव की आराधना करेंगे, तो यह पाप नष्ट हो जाएगा और जीवन में पुनः शांति स्थापित होगी।”

ऋषि के वचनों का पालन करते हुए श्रीराम और माता सीता ने छह दिनों तक मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर कठोर व्रत किया। उन्होंने नहाय-खाय से लेकर उदयगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने तक की प्रत्येक प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता से पूरी की।
उनकी आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें पापमुक्ति, तेज और शांति का आशीर्वाद दिया।

तभी से इस व्रत को सूर्य उपासना का महान पर्व – छठ पूजा कहा जाने लगा। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी लोक-आस्था का हिस्सा बन गई और आज भी भगवान श्रीराम और माता सीता की भक्ति की उसी भावना के साथ पूरे भारत में मनाई जाती है।

द्रोपदी ने रखा था छठ का व्रत | द्वापर युग में द्रौपदी और कर्ण द्वारा सूर्य उपासना

द्वापर युग में भी छठ व्रत का अत्यंत गहरा महत्व रहा है। ऐसा कहा जाता है कि जब पांडव अपने जीवन के सबसे कठिन काल – वनवास और संघर्ष के समय – से गुजर रहे थे, तब महारानी द्रौपदी ने अपने परिवार के कल्याण और संकट से मुक्ति के लिए छठ व्रत धारण किया।
उन्होंने पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ षष्ठी देवी तथा सूर्य देव की आराधना की और उनसे अपने पतियों के बल, सम्मान और समृद्धि की प्रार्थना की।

द्रौपदी की तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और पांडवों को पुनः शक्ति, यश और समृद्धि प्रदान की। इसी कारण द्वापर युग में छठ व्रत को परिवार की रक्षा और उन्नति का प्रतीक व्रत माना गया।

इसी युग में दानवीर कर्ण, जो स्वयं सूर्य देव के पुत्र थे, को सूर्य उपासना का प्रथम साधक कहा जाता है। वह प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान कर जल में खड़े होकर अर्घ्य अर्पित करते थे और सूर्य देव से तेज, शक्ति और परोपकार की भावना का आशीर्वाद प्राप्त करते थे।
उनकी इस दैनिक साधना से ही सूर्य पूजा की परंपरा लोकमानस में दृढ़ हुई, जो आगे चलकर छठ महापर्व के रूप में जन-आस्था का अभिन्न अंग बन गई।

आज भी छठ पर्व पर जब भक्त नदी और तालाबों में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो वह दृश्य मानो द्वापर युग की उसी सूर्य भक्ति की अमर गूंज को पुनः जीवंत कर देता है।

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पवन शास्त्री, साहित्याचार्य (M.A.) - Author

भारतीय धर्म, पुराण, ज्योतिष और आध्यात्मिक ज्ञान के शोधकर्ता। Sursarita.in (धर्म कथा गंगा) पर वे सरल भाषा में धार्मिक कथाएँ, राशिफल, पञ्चांग और व्रत विधियाँ साझा करते हैं।

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Pawan Shastri

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He holds an M.A. degree and is also a certified Jyotish Shastri (Astrology Expert). His articles and content aim to share devotional, musical, and spiritual knowledge in a simple, accurate, and emotionally engaging manner.

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