
Margashirsha Purnima Vrat Katha: हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि अत्यंत शुभ और पवित्र मानी गई है। मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मार्गशीर्ष पूर्णिमा कहा जाता है, और इसका विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भक्तजन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
Margashirsha Purnima Vrat Katha: मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत कथा, पूजा विधि और आरती
Margashirsha Purnima Vrat Katha:
पूर्णिमा के दिन व्रत रखने वाले लोग दिनभर फलाहार करते हैं और रात्रि में उदय हुए चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है, मनोविकार दूर होते हैं और भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है।
आज, 26 दिसंबर को साल की अंतिम पूर्णिमा का व्रत किया जा रहा है, और इस अवसर पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना तथा पढ़ना अत्यंत शुभ माना गया है। कथा का श्रवण किए बिना पूर्णिमा व्रत अधूरा माना जाता है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत कथा | Margashirsha Purnima Vrat Katha
Margashirsha Purnima Vrat Katha: हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि अत्यंत पवित्र मानी गई है। इस दिन भक्त पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और दिनभर फलाहार का पालन कर रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा, जिसे मार्गशीर्ष पूर्णिमा कहा जाता है, विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना और व्रत-पूजन करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
🌼 मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत कथा
कहा जाता है कि काशीपुर में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण रहता था। एक दिन जब वह भिक्षा मांग रहा था, तब भगवान विष्णु स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए। उन्होंने उससे कहा—
“हे विप्र! श्री सत्यनारायण भगवान सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाले हैं। तुम उनका व्रत और पूजन करो। इस व्रत से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।”
भगवान ने यह भी बताया कि उपवास का अर्थ केवल भोजन न करना नहीं है, बल्कि मन और शरीर की शुद्धता बनाए रखना, भगवान को अपने समीप अनुभव करना, और श्रद्धा-भक्ति से पूजन करना ही सच्चा उपवास है।
सत्यनारायण व्रत की कथा बताती है कि इस व्रत को करने का अधिकार हर मनुष्य को है—गरीब हो या अमीर, व्यापारी हो या राजा, ब्राह्मण हो या कोई अन्य। इसीलिए कथा में कई पात्रों की घटनाएँ जुड़ी हैं—गरीब ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा उल्कामुख, साधु वैश्य, उसकी पत्नी लीलावती, पुत्री कलावती, राजा तुंगध्वज और गोपगण।
जो भी इन सभी ने सत्यनारायण व्रत के महत्व को सुना, वे तुरंत श्रद्धा और विश्वास से व्रत-पूजन में लग गए। परिणामस्वरूप उन्हें जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति हुई।
🌺 साधु वैश्य की कथा
Margashirsha Purnima Vrat Katha: कथा में एक साधु वैश्य का भी वर्णन मिलता है। उसने राजा उल्कामुख से इस व्रत का महत्व सुना, लेकिन उसका विश्वास अधूरा था। उसने मन ही मन सोचा—
“जब मुझे संतान प्राप्त होगी, तब मैं यह व्रत करूंगा।”
समय बीतने पर उसके घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ। पत्नी ने उसे व्रत की याद दिलाई, लेकिन उसने कहा—
“कन्या के विवाह के समय व्रत करेंगे।”
समय आया, कन्या का विवाह भी हो गया, परंतु उसने फिर भी व्रत नहीं किया। एक दिन वह अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए यात्रा पर गया, जहाँ चोरी के झूठे आरोप में दोनों को राजा चंद्रकेतु ने कारागार में डाल दिया। उसी दौरान उसके घर भी चोरी हो गई। पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती को भिक्षा मांगकर गुजारा करना पड़ा।
एक दिन कलावती ने किसी घर में सत्यनारायण व्रत होते देखा। उसने वहाँ से प्राप्त प्रसाद अपनी माँ को लाकर दिया। इस प्रसंग ने लीलावती के हृदय को हिला दिया। अगले दिन उसने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से व्रत-पूजन किया और भगवान से पति व दामाद की शीघ्र वापसी का आशीर्वाद माँगा।
भगवान प्रसन्न हुए। उसी रात्रि राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश मिला—
“ये दोनों निर्दोष हैं, उन्हें तुरंत मुक्त कर दो।”
अगली सुबह राजा ने उन्हें मुक्त कर सम्मान सहित धन सहित विदा किया।
घर पहुँचकर वैश्य ने जीवनभर पूर्णिमा और संक्रांति के दिन सत्यनारायण व्रत किया और अंत में समस्त सांसारिक सुखों का आनंद लेकर मोक्ष को प्राप्त हुआ।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजा विधि
- सुबह पवित्र स्नान करें—संभव हो तो नदी या घर में गंगाजल मिलाकर।
- व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु और चंद्रदेव का ध्यान करें।
- घर के पूजा स्थान को साफ कर पीला या सफेद कपड़ा बिछाएँ।
- विष्णु भगवान की मूर्ति/चित्र स्थापित कर पीले फूल, तुलसी, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
- शाम के समय पूर्णिमा के चंद्रमा को अर्घ्य दें।
- अंत में फलाहार लेकर व्रत का पारण करें और दान-दक्षिणा दें।
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