
Paush Purnima Katha (पौष पूर्णिमा कथा): इस साल पौष पूर्णिमा व्रत 13 जनवरी को रखा जाएगा। इस दिन स्नान, दान, जप, तप और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार पौष पूर्णिमा के दिन व्रत रखने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इस दिन श्री हरि विष्णु भगवान की पूजा का विशेष महत्व होता है। चलिए आपको बताते हैं पौष पूर्णिमा व्रत के दिन कौन सी कथा पढ़ी जाती है।
Paush Purnima Vrat Katha 2025: पौष पूर्णिमा व्रत कथा, विधि व महत्व आरती सहित
🌕 पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि (Purnima Vrat Puja Vidhi)
पौष पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करना श्रेष्ठ माना जाता है, अन्यथा घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। इसके साथ ही
“ॐ घृणिः सूर्याय नमः” मंत्र का जप करें।
अब पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और उस पर साफ लाल वस्त्र बिछाएं। चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। विधिवत धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित कर पूजा करें।
शाम के समय पुनः पूजा करें और अपने सामने जल से भरा एक कलश रखें। भगवान विष्णु को पंचामृत, केला और पंजीरी का भोग अर्पित करें। इसके बाद पंडित जी को आमंत्रित कर श्री सत्यनारायण कथा का आयोजन करें तथा आस-पास के लोगों को भी कथा में सम्मिलित होने के लिए बुलाएं।
कथा पूर्ण होने के बाद सभी को प्रसाद वितरित करें और यथाशक्ति दान-दक्षिणा अवश्य दें।
🌼 विशेष लाभ के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ
पौष पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी को समर्पित कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और साधक पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं, जिससे धन-धान्य की कमी नहीं होती।
📜 पौष पूर्णिमा व्रत कथा (पूर्ण कथा)
प्राचीन समय की बात है। इस पृथ्वी पर धनेश्वर नाम का एक धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी सुशीला अत्यंत रूपवती, पतिव्रता और गुणवान थी। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, किंतु एक ही दुःख था—उन्हें संतान प्राप्त नहीं हो रही थी। इसी कारण वे दोनों मन ही मन अत्यंत दुखी रहते थे।
एक दिन एक महान तपस्वी योगी उनके नगर में आए। धनेश्वर ने देखा कि योगी अन्य घरों से भिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, किंतु उसके घर से भिक्षा नहीं ली। धनेश्वर ने विनम्रता से कारण पूछा। योगी ने कहा—“जिस घर में संतान नहीं होती, वहाँ का अन्न मुझे ग्रहण करना उचित नहीं लगता।” यह सुनकर धनेश्वर और अधिक व्यथित हो गया और योगी के चरणों में गिरकर पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछने लगा।
योगी ने कहा—“यदि तुम और तुम्हारी पत्नी श्रद्धा और नियम से 32 पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक करोगे, तो भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी।” इतना कहकर योगी अंतर्ध्यान हो गए।
योगी के आदेशानुसार धनेश्वर और उसकी पत्नी ने पौष पूर्णिमा से 32 पूर्णिमा का व्रत आरंभ किया। कुछ समय बाद भगवान शिव की कृपा से उन्हें एक सुंदर, सुशील और विद्वान पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र का नाम देवीदास रखा गया। माता-पिता अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने नियमपूर्वक पूर्णिमा का व्रत जारी रखा।
जब देवीदास बारह वर्ष का हुआ, तब भविष्यवाणी हुई कि उसकी आयु अल्प है। यह जानकर माता-पिता अत्यंत चिंतित हो गए। उन्होंने पुत्र को मामा के साथ काशी भेज दिया और माता ने पुत्र की रक्षा के लिए और भी अधिक श्रद्धा से पूर्णिमा व्रत किया।
रास्ते में देवीदास का विवाह एक सुशील और धर्मपरायण कन्या से हो गया। विवाह के पश्चात जब मृत्यु का समय आया, तब यमराज उसके प्राण लेने पहुँचे। उसी क्षण माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रार्थना की—“हे प्रभु! इस बालक की माता ने 32 पूर्णिमा का व्रत किया है, कृपा करके इसके प्राणों की रक्षा कीजिए।”
भगवान शिव ने भक्तवत्सल होकर यमराज को वापस लौटा दिया। पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से देवीदास की रक्षा हुई और वह दीर्घायु हुआ। कुछ समय बाद देवीदास अपनी पत्नी और मामा के साथ सकुशल अपने माता-पिता के घर लौट आया। पूरे नगर में आनंद और उत्सव छा गया।
धनेश्वर ने ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी और भगवान शिव-विष्णु का धन्यवाद किया। इस प्रकार पौष पूर्णिमा के व्रत से धनेश्वर पुत्रवान हुआ और उसका वंश आगे बढ़ा।
🌸 कथा फलश्रुति
जो भी स्त्री श्रद्धा, नियम और भक्ति से पौष पूर्णिमा का व्रत और कथा करती या सुनती है, उसे पुत्र-पौत्र, सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य और जीवन में शांति की प्राप्ति होती है। भगवान शिव की कृपा से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
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